
दुष्कर्म केस में बरी हुए प्रोफेसर की 20 साल की सजा रद्द, मिलेगा 10 लाख का मुआवजा
कोलकाता (द इंडियन न्यूज़पेपर ब्यूरो):
कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक आपराधिक मामले में ऐतिहासिक और बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सेरामपुर (Serampore) के एक प्रोफेसर को सुनाई गई 20 साल जेल की सजा को रद्द करते हुए उन्हें बाइज्जत बरी कर दिया है। इसके साथ ही, जांच और अभियोजन पक्ष की गंभीर खामियों के कारण जेल में बिताए गए 4 सालों के लिए राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित प्रोफेसर को 10 लाख रुपये का मुआवजा दे। कोर्ट ने माना कि यह मामला 'सिस्टम की घोर लापरवाही' और पक्षपात से प्रेरित था।
जांच अधिकारी और सरकारी वकील पर गिरी गाज
जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्बा सिन्हा रे की डिवीजन बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। बेंच ने पाया कि मामले में इन्वेस्टिगेटिंग ऑफिसर (SI) निवेदिता कोहली और स्पेशल पब्लिक प्रोसिक्यूटर (PP) जॉयदीप मुखर्जी ने अपनी ड्यूटी में भारी लापरवाही और दुर्भावना दिखाई, जिसके कारण एक सम्मानित प्रोफेसर को बिना किसी ठोस सबूत के चार साल जेल में काटने पड़े। अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजे की यह 10 लाख रुपये की रकम इन दोनों अधिकारियों से वसूली जा सकती है।
कोर्ट ने बार काउंसिल के चेयरमैन को सख्त निर्देश दिया है कि वे वकील जॉयदीप मुखर्जी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करें। वहीं, पश्चिम बंगाल के डायरेक्टर जनरल ऑफ पुलिस (DGP) को SI निवेदिता के खिलाफ भी जांच के बुनियादी नियमों की अनदेखी करने के आरोप में विभागीय कार्रवाई करने का आदेश दिया गया है।
क्या था पूरा मामला और हाई कोर्ट ने क्या पाईं खामियां?
यह मामला 23 मार्च 2022 का है। एक महिला ने सेरामपुर महिला पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई थी कि उसके पिता ने मुंबई से अपनी नाबालिग बेटी को प्रोफेसर के पास पढ़ने के लिए भेजा था, जहां उसके साथ कथित तौर पर यौन उत्पीड़न और रेप किया गया। सेरामपुर की निचली अदालत ने इसी आधार पर प्रोफेसर को 20 साल की सजा सुनाई थी।
लेकिन जब प्रोफेसर ने हाई कोर्ट का रुख किया, तो जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए:
हितों का टकराव (Conflict of Interest): स्पेशल पीपी जॉयदीप मुखर्जी, आरोपी प्रोफेसर की पत्नी की तरफ से पहले ही एक 498A (दहेज प्रताड़ना) का केस लड़ रहे थे। अदालत ने पाया कि जो वकील पत्नी का केस लड़ रहा था, वही रेप केस में सरकारी वकील बन गया, जिससे मुकदमा पूरी तरह से पक्षपाती हो गया।
कमजोर गवाह और सबूत: पुलिस ने पड़ोसियों या हाउसिंग सोसाइटी के गेट रजिस्टर की कोई जांच नहीं की। गवाह के तौर पर केवल प्रोफेसर की पत्नी और बेटे (जिनसे पहले से विवाद चल रहा था) के बयान लिए गए।
मेडिकल और फॉरेंसिक जांच की अनदेखी: पुलिस ने कोई वेजाइनल स्वैब फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा और मेडिकल रिपोर्ट में रेप से जुड़ी कोई चोट या निशान नहीं पाए गए थे।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा, "चूंकि पीड़िता के बयान विसंगतियों से भरे हुए हैं और इस केस के बुनियादी तथ्य बेहद कमजोर हैं, इसलिए सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती।" कोर्ट ने यह भी कहा कि इस आरोप और सजा के कारण एक प्रोफेसर के करियर और इज्जत को जो अपूरणीय क्षति पहुंची है, उसकी भरपाई कभी नहीं की जा सकती।


