
देश के लिए लड़ने वाले ITBP जवान के साथ ऐसा सलूक! मां का कटा हाथ लेकर थाने-थाने भटक रहा बेटा
कानपुर (द इंडियन न्यूज़पेपर ब्यूरो):
देश की सीमाओं की रक्षा करने वाले एक ITBP जवान को अपनी मां को इंसाफ दिलाने के लिए खुद के ही सिस्टम से जंग लड़नी पड़ रही है। मेडिकल प्रशासन और पुलिस के बीच तालमेल की ऐसी कमी सामने आई है, जो किसी को भी हैरान कर दे। इंडो-तिब्बतन बॉर्डर पुलिस (ITBP) के जवान विकास सिंह की मां निर्मला देवी का कटा हुआ हाथ 20 मई से कानपुर के रेलबाजार पुलिस स्टेशन के मालखाने में पड़ा है।
डॉक्टरों की कथित लापरवाही से कटे इस हाथ को मेडिकल कॉलेज में हिस्टोपैथोलॉजी टेस्ट के लिए भेजा जाना था, लेकिन पुलिस और स्वास्थ्य विभाग की कागजी कार्रवाई के बीच यह अंग अभी तक थाने से बाहर नहीं निकल सका है।
अस्पताल की लापरवाही से काटना पड़ा था हाथ
जानकारी के अनुसार, जवान विकास सिंह की मां को कुछ दिन पहले स्वास्थ्य कारणों से कानपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आरोप है कि इलाज के दौरान अस्पताल की लापरवाही की वजह से उनके हाथ में गंभीर इन्फेक्शन फैल गया और जान बचाने के लिए डॉक्टरों को उनका हाथ काटना पड़ा। इस घोर लापरवाही की शिकायत लेकर जवान विकास सिंह अपनी मां का कटा हुआ हाथ एक बक्से में रखकर पुलिस स्टेशन पहुंच गए थे। पुलिस की शुरुआती जांच में अस्पताल ने अपनी गलती भी मान ली थी।
पुलिस और CMO के बीच फंसा मामला
मामला दर्ज होने के बाद, अधिकारियों ने 20 मई को कटे हुए हाथ को सील कर दिया था। इसे जांच के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज (GSVM) भेजा जाना था। इस मामले पर रेलबाजार पुलिस स्टेशन के SHO अमन सिंह का कहना है कि मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) की ओर से उन्हें कोई लिखित निर्देश नहीं मिला है, जिसके बिना वे अंग को थाने से नहीं हटा सकते।
डिप्टी पुलिस कमिश्नर (ईस्ट) सत्यजीत गुप्ता ने भी इस बात की पुष्टि की है कि हाथ अभी थाने में है। उन्होंने बताया कि कानपुर CMO को पत्र लिखकर स्पष्ट दिशा-निर्देश मांगे गए हैं। वहीं, मामले पर CMO डॉ. हरिदत्त नेमी ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि 23 मई को उनकी रिपोर्ट आ गई थी और इसके बाद पुलिस को खुद अंग मेडिकल कॉलेज भेजना चाहिए था। खराब होने से बचाने के लिए कटे हुए अंग में कुछ केमिकल्स डाले गए हैं।
यह पूरी घटना साफ तौर पर दर्शाती है कि सिस्टम के भीतर कम्युनिकेशन की कितनी भारी कमी है। पुलिस और प्रशासन की इस सुस्ती के चलते एक पीड़ित फौजी परिवार न्याय के लिए दर-दर भटकने को मजबूर है।


