
मोबाइल में 42°C तो जमीन पर 65°C तापमान क्यों? जानिए अर्बन हीट आइलैंड का वैज्ञानिक सच
नई दिल्ली:(द इंडियन न्यूजपेपर ब्यूरो):
उत्तर भारत सहित देश की राजधानी इस समय भीषण गर्मी और लू (Heatwave) के प्रकोप से जूझ रही है। अक्सर जब हम अपने स्मार्टफोन में वेदर ऐप देखते हैं, तो तापमान 42°C से 45°C के बीच दिखाई देता है। लेकिन क्या आपने कभी महसूस किया है कि जब आप दोपहर में सड़क पर निकलते हैं, तो गर्मी इस आंकड़े से कहीं ज्यादा भयानक लगती है?
हाल ही में दिल्ली के विभिन्न इलाकों में थर्मल कैमरों (Thermal Cameras) के जरिए जमीनी स्तर पर तापमान की जांच की गई, जिसमें चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। जब मोबाइल ऐप्स हवा का तापमान 42°C दिखा रहे थे, उसी वक्त सीधी धूप में तप रही कोलतार (डामर) की सड़कों और वाहनों की सतह का तापमान 65 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर रिकॉर्ड किया गया।
इतने बड़े अंतर को देखकर आम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर मौसम विभाग के आंकड़ों और जमीन की असलियत में इतना फर्क क्यों होता है? आइए इसके पीछे के वैज्ञानिक कारणों को समझते हैं।
वेदर ऐप और ज़मीनी तापमान में इतना अंतर क्यों?
मौसम विभाग (IMD) या मोबाइल ऐप्स द्वारा दिखाया जाने वाला तापमान दरअसल 'एम्बिएंट एयर टेम्परेचर' (Ambient Air Temperature) यानी हवा का तापमान होता है। इसे मापने के लिए एक तय वैज्ञानिक तरीका अपनाया जाता है:
तापमान मापने वाले उपकरणों (Sensors) को जमीन से करीब 1.2 से 2 मीटर की ऊंचाई पर रखा जाता है।
इन उपकरणों को सीधे सूरज की रोशनी से बचाकर, एक हवादार और छायादार बॉक्स (Stevenson Screen) के अंदर रखा जाता है।
इसके विपरीत, जब हम सड़कों पर होते हैं, तो हमारा सामना 'सरफेस टेम्परेचर' (Surface Temperature) यानी सतह के तापमान से होता है। कंक्रीट की इमारतें, डामर की सड़कें और गाड़ियां सूरज की किरणों को सीधे सोखती हैं, जिससे उनका तापमान हवा के मुकाबले 20 से 25 डिग्री तक ज्यादा हो जाता है।
क्या है 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट'?
शहरों का तापमान गांवों या जंगलों की तुलना में बहुत अधिक होने का मुख्य कारण 'अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट' (Urban Heat Island Effect) है।
गर्मी सोखने वाली सतहें: आधुनिक शहरों में कंक्रीट, सीमेंट और तारकोल का जाल बिछा है। ये सामग्रियां दिन के समय सूरज की गर्मी को अपने अंदर जमा (Absorb) कर लेती हैं।
रात में भी गर्मी का अहसास: कंक्रीट की ये सतहें रात के समय उस रुकी हुई गर्मी को धीरे-धीरे वातावरण में छोड़ती हैं (Radiation)। यही वजह है कि शहरों में रातें भी उतनी ठंडी नहीं हो पातीं।
तापमान को 20°C तक कम कर देता है एक पेड़: जानिए कैसे
इसी जमीनी जांच में एक और दिलचस्प वैज्ञानिक पहलू सामने आया। जहां सीधी धूप में सड़क का तापमान 65°C था, वहीं महज कुछ मीटर की दूरी पर स्थित एक घने पेड़ की छांव के नीचे तापमान घटकर लगभग 40°C से 42°C पर आ गया। यानी सिर्फ एक पेड़ ने सतह के तापमान को 20 से 25 डिग्री सेल्सियस तक कम कर दिया।
पेड़ पर्यावरण को ठंडा रखने के लिए मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक प्रक्रियाओं पर काम करते हैं:
इवैपोट्रांसपिरेशन (Evapotranspiration): पेड़ अपनी जड़ों से पानी सोखते हैं और उसे पत्तियों के छोटे छिद्रों के जरिए वाष्प (Water Vapor) बनाकर हवा में छोड़ते हैं। यह बिल्कुल वैसे ही काम करता है जैसे हमारे शरीर को ठंडा रखने के लिए पसीना आता है। इस प्रक्रिया से आसपास की हवा की गर्मी कम हो जाती है।
शेडिंग इफेक्ट (Shading Effect): पेड़ों की घनी कैनोपी (पत्तियों का घेरा) सूर्य की किरणों को सीधे जमीन, फुटपाथ या कंक्रीट पर पड़ने से रोक देती है, जिससे वे सतहें गर्म ही नहीं हो पातीं।


