
मृत यात्री के पास टिकट नहीं मिला तो भी मुआवजा नहीं होगा खारिज, सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
नमस्कार दोस्तों,
सुप्रीम कोर्ट ने रेल हादसे से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि मृत यात्री के पास से ट्रेन टिकट बरामद नहीं होने मात्र से मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने गुजरात के 2017 के एक रेल हादसे में मृतक के माता-पिता को दिए गए 8 लाख रुपये के मुआवजे को बहाल कर दिया।
यह मामला गुजरात के महेशभाई से जुड़ा है, जो 27 सितंबर 2017 को ट्रेन से सफर कर रहे थे। अचानक झटका लगने के बाद वह चलती ट्रेन से गिर गए थे। हादसे में उन्हें गंभीर चोटें आईं और करीब एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में इलाज चला। बाद में 31 अक्टूबर 2017 को उनकी मौत हो गई।
मृतक के माता-पिता ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण में मुआवजे की मांग की थी। ट्रिब्यूनल ने 17 जून 2022 को उन्हें 8 लाख रुपये मुआवजा और 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया था। हालांकि, गुजरात हाईकोर्ट ने बाद में टिकट बरामद नहीं होने समेत अन्य परिस्थितियों को देखते हुए इस आदेश को पलट दिया था।
जस्टिस उज्जल भुइयां और एएस चंदुरकर की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने टिकट नहीं मिलने के तथ्य को जरूरत से ज्यादा महत्व दिया। अदालत ने मृतक के पिता के शपथ-पत्र और इस तथ्य पर भी गौर किया कि हादसे के बाद महेशभाई एक महीने से अधिक समय तक अस्पताल में भर्ती रहे थे।
कोर्ट के अनुसार, उपलब्ध परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर यह माना जा सकता है कि महेशभाई वास्तविक रेल यात्री थे। इसलिए सिर्फ टिकट बरामद न होने के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मृतक के पिता ने शपथ लेकर बताया था कि उनके बेटे ने टिकट खरीदा था। इसके बाद रेलवे पर इस दावे को गलत साबित करने की जिम्मेदारी थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि रेलवे की ओर से जांच किए गए गवाह मृतक की जेबों की जांच करने में विफल रहे थे।
अदालत ने रेलवे की जांच रिपोर्ट में हुई देरी का भी उल्लेख किया। रिपोर्ट करीब सात महीने बाद तैयार हुई थी। कोर्ट ने कहा कि इस देरी के लिए मृतक के परिवार को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण के आदेश को बहाल करते हुए 8 लाख रुपये का मुआवजा मृतक के माता-पिता को देने का निर्देश दिया। रिपोर्ट के अनुसार, रेलवे को यह राशि 30 दिनों के भीतर देने को कहा गया है।
फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर ऐसे मामले में बिना किसी जांच के मुआवजा स्वतः मिल जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि टिकट का न मिलना अकेले निर्णायक नहीं है। यात्री के वास्तविक रेल यात्री होने का आकलन शपथ-पत्र, परिस्थितियों और उपलब्ध अन्य साक्ष्यों के आधार पर किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने रेल हादसे से जुड़े मुआवजा मामले में फैसला दिया।
मृत यात्री के पास टिकट नहीं मिलने को अकेले मुआवजा खारिज करने का आधार नहीं माना जा सकता।
मामला गुजरात के 2017 के रेल हादसे से जुड़ा था।
मृतक महेशभाई की बाद में अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हुई थी।
रेलवे दावा न्यायाधिकरण ने 8 लाख रुपये मुआवजा दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने यह मुआवजा बहाल कर दिया।
अदालत ने परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों को महत्वपूर्ण माना।
हां। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि केवल टिकट बरामद न होने के आधार पर मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। मामले के अन्य तथ्यों और साक्ष्यों को भी देखा जाएगा।
यह मामला गुजरात में 2017 में हुए रेल हादसे से संबंधित है।
रेलवे दावा न्यायाधिकरण द्वारा 8 लाख रुपये का मुआवजा निर्धारित किया गया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बहाल कर दिया।
नहीं। अदालत ने यह नहीं कहा कि हर मामले में बिना टिकट के बावजूद मुआवजा स्वतः मिलेगा। यह देखा जाएगा कि उपलब्ध परिस्थितियों और साक्ष्यों से व्यक्ति के वास्तविक यात्री होने की पुष्टि होती है या नहीं।
यह खबर सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में दी गई जानकारी के आधार पर तैयार की गई है। रेल हादसे से जुड़े मुआवजे के मामलों में अंतिम निर्णय संबंधित मामले के तथ्यों, साक्ष्यों और लागू कानून के आधार पर होता है।


