
इलाहाबाद हाई कोर्ट से हुई गलती? SC ने हत्या के आरोपी को 9 साल बाद दी जमानत, कहा- ये जीने के अधिकार का हनन
नई दिल्ली (द इंडियन न्यूज़पेपर ब्यूरो):
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने विचाराधीन कैदियों (Undertrial Prisoners) के अधिकारों को लेकर एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि किसी भी विचाराधीन कैदी को अनिश्चित काल तक जेल की सलाखों के पीछे नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत दिए गए जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
यह ऐतिहासिक टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने एक हत्या के मामले में सुनवाई करते हुए की। इस केस में आरोपी पिछले 9 सालों से बिना सजा तय हुए जेल में बंद था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दी थी याचिका
लाइव लॉ (Live Law) की रिपोर्ट के अनुसार, इस विचाराधीन कैदी पर हत्या और आपराधिक साजिश के तहत IPC की धारा 120B, 147, 148, 149 और 302 के तहत मुकदमा चल रहा है। आरोपी ने पहले जमानत के लिए इलाहाबाद हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, हाई कोर्ट ने उसकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि हत्या जैसे गंभीर मामले में मुकदमा शुरू होने के बाद फैसले तक जमानत नहीं दी जानी चाहिए। इसके बाद कैदी ने न्याय की गुहार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई बहस?
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के सामने दलील दी कि उनका मुवक्किल पिछले 9 सालों से ज्यादा समय से जेल में बंद है और अब तक उसे दोषी करार नहीं दिया गया है। वकील ने यह भी जानकारी दी कि इसी मामले से जुड़े एक अन्य सह-आरोपी को 29 अप्रैल 2026 को जमानत मिल चुकी है।
हाई कोर्ट से हुई फैसले को समझने में चूक
लंबी बहस सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने शीर्ष अदालत के एक पुराने फैसले (‘X बनाम राजस्थान’ मामला) को समझने में गलती की है। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष परिस्थिति में जमानत खारिज की थी, लेकिन हाई कोर्ट ने उसे एक सामान्य नियम मान लिया।
सुप्रीम कोर्ट ने विचाराधीन कैदी को जमानत देते हुए कड़ी टिप्पणी की, "अगर कोई व्यक्ति विचाराधीन कैदी के तौर पर 9 साल से ज्यादा समय से जेल में बंद है, तो यह अनुच्छेद 21 के तहत मिले अधिकारों का हनन है। उसे जमानत पाने का पूरा हक है।" इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट्स को यह भी याद दिलाया कि किसी भी कैदी के "शीघ्र सुनवाई (Speedy Trial) के अधिकार" को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।


