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GENERAL / LATEST NEWS | 2026-10-03
SIR विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों के बीच CEC के खिलाफ याचिका

SIR विवाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, दो चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों के बीच CEC के खिलाफ याचिका

द इंडियन न्यूजपेपर ब्यूरो:

नमस्कार दोस्तों,

चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। अधिवक्ता शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जनहित याचिका दायर की है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—की सहमति के बिना लिए गए।

क्या है याचिका में दावा?

याचिका में मांग की गई है कि ऐसे फैसलों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को अवैध घोषित किया जाए, जिनके बारे में याचिकाकर्ता का दावा है कि वे चुनाव आयोग के बहुमत की सहमति के बिना किए गए। याचिका में 2023 के संबंधित कानून की धारा 18 का भी हवाला दिया गया है।

याचिका में SIR के दौरान मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के आरोपों की स्वतंत्र जांच की मांग भी की गई है। इसके अलावा ECINet और ERONet डेटाबेस का फोरेंसिक ऑडिट कराने तथा संबंधित सर्वर लॉग, डेटाबेस और संचार रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग की गई है।

दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का क्या मामला है?

यह याचिका उन मीडिया रिपोर्टों के बाद सामने आई है, जिनमें दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों में कम से कम 14 मौकों पर चुनाव आयोग के कुछ फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में SIR, मतदाता नामों को जोड़ने-हटाने और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख है।

हालांकि, चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों में बताए गए आंतरिक मतभेद के दावे को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और अलग-अलग मुद्दों पर अधिकारियों की टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श का हिस्सा हैं।

याचिका में क्या-क्या मांग की गई?

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से कई राहतों की मांग की है। इनमें कथित तौर पर बिना बहुमत की सहमति लिए गए फैसलों को निरस्त करना, स्वतंत्र न्यायिक जांच या SIT गठित करना और ECINet-ERONet सिस्टम का फोरेंसिक ऑडिट शामिल है।

याचिका में Form 6 में कथित बदलावों को भी चुनौती दी गई है और उसे संबंधित वैधानिक नियमों के अनुरूप मूल स्वरूप में बहाल करने की मांग की गई है।

SIR पर सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कह चुका है?

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में बिहार में SIR को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाया था। कोर्ट ने चुनाव आयोग के SIR कराने के अधिकार को बरकरार रखा था और प्रक्रिया में सुरक्षा उपायों को लेकर निर्देश दिए थे।

वर्तमान याचिका का मुद्दा हालांकि अलग है। इसमें मुख्य रूप से चुनाव आयोग के आंतरिक निर्णय लेने की प्रक्रिया, कथित आपत्तियों और SIR से जुड़े प्रशासनिक एवं तकनीकी फैसलों को चुनौती दी गई है।

मुख्य बातें (Highlights)

SIR से जुड़े चुनाव आयोग के फैसलों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल हुई।

याचिका मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर की गई है।

दो चुनाव आयुक्तों की कथित लिखित आपत्तियों का हवाला दिया गया है।

याचिका में SIR से जुड़े कथित एकतरफा फैसलों को निरस्त करने की मांग है।

ECINet और ERONet के फोरेंसिक ऑडिट की मांग की गई है।

चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेद के दावे को खारिज करते हुए SIR से जुड़े फैसलों को सर्वसम्मत बताया है।

FAQs
सवाल 1: सुप्रीम कोर्ट में याचिका क्यों दाखिल हुई है?

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया है कि SIR से जुड़े कुछ फैसले दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए। इसी आधार पर फैसलों की वैधता को चुनौती दी गई है।

सवाल 2: किन दो चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों का जिक्र है?

रिपोर्टों में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की कथित लिखित आपत्तियों का उल्लेख है।

सवाल 3: चुनाव आयोग का इस विवाद पर क्या कहना है?

चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR से जुड़े उसके फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और अलग-अलग विचार या टिप्पणियां संस्थागत विचार-विमर्श का सामान्य हिस्सा हैं।

सवाल 4: क्या सुप्रीम कोर्ट ने SIR को पहले मंजूरी दी है?

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में SIR कराने के चुनाव आयोग के अधिकार को बरकरार रखा था। मौजूदा याचिका मुख्य रूप से आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया और कथित एकतरफा फैसलों से जुड़े मुद्दों पर है।

डिस्क्लेमर:

यह रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका, चुनाव आयोग के बयान और उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों पर आधारित है। याचिका में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। मामले में अदालत का अंतिम निर्णय आने तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

WRITTEN AND PUBLISHED BY SANDEEP SINGH, FOUNDER & EDITOR