
ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट का कड़ा विरोध: 2 लाख से अधिक लोगों ने ऑनलाइन पिटीशन पर किए हस्ताक्षर, जानें पूरा विवाद
नई दिल्ली (द इंडियन न्यूजपेपर ब्यूरो):
केंद्र सरकार के महत्वाकांक्षी 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट' (Great Nicobar Project) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। भारत के इस सामरिक (Strategic) और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के खिलाफ पर्यावरणविदों, वैज्ञानिकों और आम नागरिकों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और पर्यावरण मंत्रालय को संबोधित करते हुए एक ऑनलाइन पिटीशन शुरू की गई है, जिस पर अब तक 2 लाख 10 हजार से अधिक लोग हस्ताक्षर (Sign) कर चुके हैं।
क्या है 'ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट'?
यह लगभग 72,000 से 80,000 करोड़ रुपये का एक विशाल मेगा प्रोजेक्ट है, जिसे अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के विकास और सामरिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस योजना के तहत वहां एक अंतरराष्ट्रीय ट्रांसशिपमेंट पोर्ट (बंदरगाह), एक नया एयरपोर्ट, पावर प्लांट और एक टाउनशिप (शहर) बसाने की तैयारी है।
आखिर क्यों हो रहा है इतना बड़ा विरोध?
याचिकाकर्ताओं और पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस प्रोजेक्ट को लेकर मुख्य रूप से तीन बड़ी चिंताएं जताई हैं:
पर्यावरण और पेड़ों की कटाई: विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस बड़े निर्माण कार्य के लिए ग्रेट निकोबार के घने जंगलों में लाखों पेड़ काटे जाएंगे। इससे वहां मौजूद दुर्लभ जीवों, जैसे- लेदरबैक कछुए (Leatherback Turtles) और कोरल रीफ के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडरा रहा है।
जनजातियों (Tribes) के विस्थापन का डर: ग्रेट निकोबार द्वीप 'शोम्पेन' (Shompen) और 'निकोबारी' जैसी अति-संवेदनशील और सदियों पुरानी जनजातियों का घर है। यह समुदाय बाहरी दुनिया से पूरी तरह कटे हुए हैं। लोगों का मानना है कि भारी निर्माण और बाहरी लोगों के बसने से इन जनजातियों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा।
प्राकृतिक आपदाओं का खतरा: यह पूरा क्षेत्र भूकंप (Seismic Zone) और सुनामी के लिहाज से बेहद संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में यहां भारी कंक्रीट का निर्माण करना एक बड़ा जोखिम साबित हो सकता है।
मामला कोर्ट में भी:
आपको बता दें कि यह मामला सिर्फ पिटीशन तक ही सीमित नहीं है, बल्कि 'फॉरेस्ट राइट्स एक्ट' (FRA) के कथित उल्लंघन को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट में भी इस प्रोजेक्ट को चुनौती दी गई है। हालांकि, सरकार और प्रशासन की तरफ से लगातार यह आश्वासन दिया जा रहा है कि इस प्रोजेक्ट में पर्यावरण और जनजातियों की सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।


